भारत के इतिहास को समझना (CH-1) Notes in Hindi || Class 12 History Chapter 1 in Hindi ||

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पाठ – 1

भारत के इतिहास को समझना

In this post we have given the detailed notes of class 12 history chapter 1 Bharat ke itihas ko samjhna (Peasants, Zamindars and the State Agrarian Society and the Mughal Empire) in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 12 board exams.

इस पोस्ट में क्लास 12 के इतिहास के पाठ 1 भारत के इतिहास को समझना (Peasants, Zamindars and the State Agrarian Society and the Mughal Empire) के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 12 में है एवं इतिहास विषय पढ़ रहे है।

Board CBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject History
Chapter no. Chapter
Chapter Name भारत के इतिहास को समझना (Peasants, Zamindars and the State Agrarian Society and the Mughal Empire)
Category Class 12 History Notes in Hindi
Medium Hindi
Class 12 History Chapter 1 भारत के इतिहास को समझना (Peasants, Zamindars and the State Agrarian Society and the Mughal Empire) in Hindi
Class 12 History Chapter 1भारत के इतिहास को समझना (Peasants, Zamindars and the State Agrarian Society and the Mughal Empire) in Hindi
Class 12 History Chapter 1 भारत के इतिहास को समझना (Peasants, Zamindars and the State Agrarian Society and the Mughal Empire) in Hindi

परिचय

  • भारत के इतिहास के सम्बन्ध के बहुत से स्त्रोत उपलब्ध हैं, कुछ स्त्रोत काफी विश्वसनीय व वैज्ञानिक हैं, अन्य मान्यताओं पर आधारित हैं। 
  • प्राचीन भारत के इतिहास के सम्बन्ध में जानकारी के मुख्य स्त्रोतों को 3 भागों में बांटा जा सकता जो निम्नलिखित हैं : –
    • पुरातात्विक स्त्रोत
    • साहित्यिक स्त्रोत
    • विदेशी स्त्रोत

पुरातात्विक स्त्रोत (Archaeological Sources)

  • पुरातात्विक स्त्रोत का सम्बन्ध प्राचीन अभिलेखों, सिक्कों, स्मारकों, भवनों, मूर्तियों तथा चित्रकला से है,
  • इन स्त्रोतों की सहायता से प्राचीन काल की काफी सटीक जानकारी मिलती है। 
  • इन स्त्रोतों से लोगों के रहन-सहन, कला, जीवन शैली व अर्थव्यवस्था इत्यादि का पता चलता है। 
  • इस प्रकार के प्राचीन स्त्रोतों का अध्ययन करने वालो को पुरातत्वविद कहा जाता है।

अभिलेख (Inscriptions)

  • भारतीय इतिहास के बारे में प्राचीन काल के कई शासकों के अभिलेखों से काफी महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई है। 
  • यह अभिलेख पत्थर, स्तम्भ, धातु की पट्टी तथा मिट्टी की वस्तुओं पर उकेरे हुए प्राप्त हुए हैं। 
  • इन प्राचीन अभिलेखों के अध्ययन को पुरालेखशास्त्र कहा जाता है, 
  • जबकि इन अभिलेखों की लिपि के अध्ययन को पुरालिपिशास्त्र कहा जाता है। 
  • अभिलेखों का उपयोग शासकों द्वारा आमतौर पर अपने आदेशों का प्रसार करने के लिए करते थे।
  • यह अभिलेख आमतौर पर ठोस सतह वाले स्थानों अथवा वस्तुओं पर मिलते हैं, लम्बे समय तक अमिट्य बनाने के लिए इन्हें ठोस सतहों पर लिखा जाता है। 
  • इस प्रकार के अभिलेख मंदिर की दीवारों, स्तंभों, स्तूपों, मुहरों तथा ताम्रपत्रों इत्यादि पर प्राप्त होते हैं। 
  • यह अभिलेख अलग-अलग भाषाओँ में लिखे गए हैं, इनमे से प्रमुख भाषाएँ संस्कृत और पाली हैं, दक्षिण भारत की भी कई भाषाओँ में काफी अभिलेख प्राप्त हुए हैं।
  • भारत के इतिहास के बारे में सबसे प्राचीन अभिलेख सिन्धु घाटी सभ्यता से प्राप्त हुए हैं, यह अभिलेख लगभग 2500 ईसा पूर्व के हैं। 
  • सिन्धु घाटी सभ्यता की लिपि अभी तक न समझ आने के कारण अभी तक इन अभिलेखों का सार ज्ञात नहीं हो सका है। सिन्धु घाटी सभ्यता की लिपि में प्रतीक चिन्हों का उपयोग किया गया है,
  • पश्चिम एशिया से काफी प्राचीन अभिलेख प्राप्त हुए हैं, हालांकि यह अभिलेख सिन्धु घाटी सभ्यता के जितने पुराने नहीं है। 
  • इन अभिलेखों में वैदिक देवताओं इंद्र, वरुण तथा नासत्य का उल्लेख मिलता है। 
  • मौर्य सम्राट अशोक ने अपने शासनकाल में काफी अभिलेख स्थापित किये। 
  • ब्रिटिश पुरातत्वविद जेम्स प्रिन्सेप ने सबसे पहले 1837 में अशोक के अभिलेखों को समझा। 
  • यह अभिलेख सम्राट अशोक द्वारा ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण करवाए गए थे। 
  • अभिलेख उत्कीर्ण करवाने का मुख्य उद्देश्य शासकों द्वारा अपने आदेश को जन-सामान्य तक पहुँचाने के लिए किया जाता था।
  • सम्राट अशोक के अतिरिक्त अन्य शासकों ने भी अभिलेख उत्कीर्ण करवाए, यह अभिलेख सम्राट द्वारा किसी क्षेत्र पर विजय अथवा अन्य महत्वपूर्ण अवसर पर उत्कीर्ण करवाए जाते थे। 
  • प्राचीन भारत के सम्बन्ध कुछ महत्वपूर्ण अभिलेख इस प्रकार हैं – 
    • ओडिशा के खारवेल में हाथी गुम्फा अभिलेख, 
    • रूद्रदमन द्वारा उत्कीर्ण किया गया जूनागढ़ अभिलेख 
  • अधिकतर प्राचीन अभिलेखों में प्राकृत भाषा का उपयोग किया गया है, अभिलेखों में संस्कृत भाषा में भी सन्देश उत्कीर्ण किये गए हैं। 
  • संस्कृत का उपयोग अभिलेखों में ईसा की दूसरी शताब्दी में दृश्यमान होता है, संस्कृत अभिलेख का प्रथम प्रमाण जूनागढ़ अभिलेख से मिलता है, यह अभिलेख संस्कृत भाषा में लिखा गया था।

सिक्के (Coins)

  • प्राचीन काल में लेन-देन के लिए उपयोग की जाने वाली वस्तु विनिमय प्रणाली (Barter System) के बाद सिक्के प्रचलन में आये। 
  • यह सिक्के विभिन्न धातुओं जैसे सोना, तांबा, चाँदी इत्यादि से बनाये जाते थे। 
  • आमतौर प्राचीन सिक्कों पर चिह्न पाए गए हैं। इस प्रकार से सिक्कों को आहत सिक्के कहा जाता है। 
  • इन सिक्कों में तिथियाँ, राजा तथा देवताओं के चित्र अंकित किये जाने लगे। 
  • आहत सिक्कों के सबसे प्राचीन भंडार पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा मगध से प्राप्त हुए हैं। 
  • भारत में स्वर्ण मुद्राएं सबसे पहले हिन्द-यूनानी शासकों ने जारी की, और इन शासकों ने सिक्कों के निर्माण में “डाई विधि” का उपयोग किया। 
  • कुषाण शासकों द्वारा जारी की गयी स्वर्ण मुद्राएं सबसे अधिक शुद्ध थी। 
  • जबकि गुप्त शासकों द्वारा सबसे ज्यादा मात्र में स्वर्ण मुद्राएं जारी की। सातवाहन शासकों ने सीसे की मुद्राएं जारी की।

अन्य उपयोगी पुरातात्विक स्त्रोत

  • अभिलेख एवं सिक्कों से प्राचीन काल के सम्बन्ध में बहुत सारी सटीक जानकारी प्राप्त होती है। 
  • लेकिन अभिलेखों और सिक्कों के अलावा अन्य महत्वपूर्ण स्त्रोत भी हैं जिनसे प्राचीन काल के सम्बन्ध में उपयोगी जानकारी प्राप्त होती है, 
    • इन स्त्रोतों में इमारतें, 
    • मंदिर, 
    • स्मारक, 
    • मूर्तियाँ, 
    • मिट्टी से बने बर्तन तथा 
    • चित्रकला प्रमुख है।
  • प्राचीनकाल की वास्तुकला की जानकारी के लिए इमारतें 
    • जैसे मंदिर व भवन काफी उपयोगी स्त्रोत हैं। 
  • वास्तुकला की जानकारी के साथ-साथ इन इमारतों से उस समय की सामाजिक, आर्थिक व धार्मिक व्यवस्था की भी जानकारी मिलती है।
  • इन स्मारकों को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है – 
    • देशी तथा 
    • विदेशी स्मारक। 
  • देशी स्मारकों में हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, नालंदा, हस्तिनापुर प्रमुख हैं। 
  • विदेशी समारकों में कंबोडिया का अंकोरवाट मंदिर, इंडोनेशिया में जावा का बोरोबुदूर मंदिर तथा बाली से प्राप्त मूर्तियाँ प्रमुख हैं। 

साहित्यिक स्त्रोत

 

  • भारत के इतिहास में के सन्दर्भ में सर्वाधिक स्त्रोत साहित्यिक स्त्रोत हैं। प्राचीन काल में पुस्तकें हाथ से लिखी जाती थी, हाथ से लिखी गयी इन पुस्तकों को पांडुलिपि कहा जाता है।  पांडुलिपियों को ताड़पत्रों तथा भोजपत्रों पर लिखा जाता था।  
  • इस प्राचीन साहित्य को 2 भागों में बांटा जा सकता है :-
    • धार्मिक साहित्य 
    • गैर धार्मिक साहित्य 

धार्मिक साहित्य

    • भारत में प्राचीन काल में तीन मुख्य धर्मो हिन्दू, बौद्ध तथा जैन धर्म का उदय हुआ। इन धर्मों के विस्तार के साथ-साथ विभिन्न दार्शनिकों, विद्वानों तथा धर्माचार्यो द्वारा अनेक धार्मिक पुस्तकों की रचना की गयी।
    • इन धार्मिक साहित्य की प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं:
  • हिन्दू धर्म से सम्बंधित साहित्य

      • हिन्दू धर्म विश्व का सबसे प्राचीनतम धर्मो में से एक है। 
      • प्राचीन भारत में इसका उदय होने से प्राचीन भारतीय समाज की विस्तृत जानकारी हिन्दू धर्म से सम्बंधित पुस्तकों से मिलती हैं।
      • हिन्दू धर्म में अनेक ग्रन्थ, पुस्तकें तथा महाकाव्य इत्यादि की रचना की गयी हैं, 
      • इनमे प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार से है – वेद, वेदांग, उपनिषद, स्मृतियाँ, पुराण, रामायण एवं महाभारत। 
      • इन धार्मिक ग्रंथों से प्राचीन भारत की राजव्यवस्था, धर्म, संस्कृति तथा सामाजिक व्यवस्था की विस्तृत जानकारी मिलती है।

 

  • वेद

      • हिन्दू धर्म में वेद अति महत्वपूर्ण साहित्य हैं, 
      • वेदों की कुल संख्या चार है। 
        • ऋग्वेद, 
        • यजुर्वेद, 
        • सामवेद तथा 
        • अथर्ववेद 
      • ऋग्वेद विश्व की सबसे प्राचीन पुस्तकों में से एक है, 
      • इसकी रचना लगभग 1500-1000 ईसा पूर्व के समयकाल में की गयी। 
      • जबकि यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद  की रचना लगभग 1000-500 ईसा पूर्व  के समयकाल में की गयी।  
  • ब्राह्मण 

      • ब्राह्मणों को वेदों के साथ जोड़ा गया है, ब्राह्मण वेदों के ही भाग हैं।
      • प्रत्येक वेद के ब्राह्मण अलग हैं। 
      • यह ब्राह्मण ग्रंथ गद्य शैली में हैं, इनमे विभिन्न विधि-विधानों तथा कर्मकांड का विस्तृत वर्णन है। 
      • ब्राह्मणों में वेदों का सार सरल शब्दों में दिया गया है, इन ब्राह्मण ग्रंथों की रचना विभिन्न ऋषियों द्वारा की गयी। 
        • ऐतरेय तथा शतपथ ब्राह्मण ग्रंथो के उदहारण हैं।
  • आरण्यक

      • आरण्यक शब्द ‘अरण्य’ से से बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ “वन” होता है। 
      • आरण्यक वे धर्म ग्रन्थ हैं, जिन्हें वन में ऋषियों द्वारा लिखा गया। 
  • वेदांग

      • जैसा की नाम से स्पष्ट है, वेदांग, वेदों के अंग हैं। 
      • वेदांगों में वेद के गूढ़ ज्ञान को सरल भाषा में लिखा गया है। 
      • शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद व ज्योतिष कुल 6 वेदांग हैं।
  • उपनिषद

      • उपनिषदों की विषयवस्तु दार्शनिक है, यह ग्रंथों के अंतिम भाग हैं। 
      • इसलिए इन्हें वेदांत भी कहा जाता है। 
      • उपनिषदों में प्रशनोत्तरी के माध्यम से अध्यात्म व दर्शन के विषय पर चर्चा की गयी है। 
      • उपनिषदों की कुल संख्या 108 है। 
  • स्मृतियाँ

      • स्मृतियों में मनुष्य के जीवन के सम्पूर्ण कार्यों की विवेचना की गयी है, इन्हें धर्मशास्त्र भी कहा जाता है।
      • ये वेदों की अपेक्षा कम जटिल हैं। 
      • इनमे कहानीयों व उपदेशों का संकलन है। 
      • मनुसमृति व याज्ञवल्क्य स्मृति सबसे प्राचीन स्मृतियाँ हैं। 
  • रामायण 

      • रामायण की रचना महर्षि वाल्मीकि ने की। 
      • रचना के समय रामायण में 6,000 श्लोक थे, परन्तु समय के साथ साथ इसमें बढ़ोत्तरी होती गयी।
      • रामायण को कुल 7 खंडो में विभाजित किया गया है – 
        • बालकाण्ड, 
        • अयोध्याकाण्ड, 
        • अरण्यकाण्ड, 
        • किष्किन्धाकाण्ड, 
        • सुन्दरकाण्ड, 
        • युद्धकाण्ड तथा 
        • उत्तरकाण्ड।
  • महाभारत

      • महाभारत विश्व के सबसे बड़े महाकाव्यों में से एक है, इसकी रचना महर्षि  वेद व्यास ने की। 
      • यह एक काव्य ग्रन्थ है। 
      • इसे पंचम वेद भी कहा जाता है। 
      • यह प्रसिद्ध यूनानी ग्रंथों इलियड और ओडिसी की तुलना में काफी बड़ा है।
      • रचना के समय इसमें 8,800 श्लोक थे, जिस कारण इसे जयसंहिता कहा जाता था।  
  • पुराण

    • पुराणों में सृष्टि, प्राचीन ऋषि मुनियों व राजाओं का वर्णन है।
    • पुराणों की कुल संख्या 18 है, प्राचीन आख्यानों का वर्णन होने से इन्हें पुराण कहा जाता है। 
    • पुराणों में विभिन्न देवी-देवताओं को केंद्र मानकर पाप व पुण्य, धर्म-कर्म इत्यादि का वर्णन किया गया है।
    • मतस्य पुराण में सातवाहन वंश का वर्णन है जबकि वायु पुराण में गुप्त वंश का वर्णन है।  
  • बौद्ध धर्म से सम्बंधित साहित्य

      • बौद्ध धर्म के प्रचार के साथ-साथ इसके साहित्य में भी वृद्धि हुई, 
      • बौद्ध साहित्य के मुख्य अंग हैं।  
        • जातक 
        • पिटक 
        • जातक में महात्मा बुद्ध के पूर्व जन्मो का वर्णन है। 
        • यह कथाएँ हैं, इसमें प्राचीन भारत के समाज की जानकारी मिलती है। 
        • त्रिपिटक सबसे पुराना बौद्ध साहित्य का ग्रन्थ है, त्रिपिटक की रचना महात्मा बुद्ध के निर्वाण के पश्चात की गयी थी।
        • इनकी रचना पाली भाषा में की गयी है। 
        • त्रिपिटक के तीन भाग हैं – 
          • सुत्तपिटक, 
          • विनयपिटक तथा 
          • अभिधम्मपिटक।
        • त्रिपिटक में प्राचीन भारत की सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था का आभास होता है। 
  • जैन धर्म से सम्बंधित साहित्य

    • प्राचीन जैन ग्रंथो को पूर्व कहा जाता है।  
    • इसमें महावीर का द्वारा प्रतिपादित किये गये सिद्धांतों का वर्णन है। 
    • यह प्राकृत भाषा में लिखे गए हैं। 

गैर–धार्मिक साहित्य

  • धर्म के अलावा अन्य साहित्य को धर्मेत्तर साहित्य कहा जाता है। इसमें ऐतिहासिक पुस्तकें, जीवनी, वृत्तांत इत्यादि शामिल हैं। 
  • गैर-धार्मिक साहित्य में विद्वानों व कूटनीतिज्ञों की रचनाएँ प्रमुख है। 
  • इससे प्राचीन राज्यों में विद्यमान राजव्यवस्था, अर्थवयवस्था, लोगों की जीवनशैली तथा तत्कालीन समाज के बारे में उपयोगी जानकारी मिलती है।
  • 6वीं शाताब्दी में पाणिनी द्वारा रचित “अष्टाध्यायी” संस्कृत व्याकरण है,  मौर्यकाल में कौटिल्य की पुस्तक “अर्थशास्त्र” से शासन व्यवस्था की महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। 
  • विशाखदत्त द्वारा रचित “मुद्राराक्षस”, सोमदेव द्वारा रचित “कथासरितसागर” तथा क्षेमेद्र द्वारा रचित “वृहतकथामंजरी” से मौर्यकाल के बारे में काफी जानकारी मिलती है। 
  • इन पुस्तकों में तत्कालीन धार्मिक, आर्थिक व सामाजिक व्यवस्था सभी पहलुओं के बारे में पता चलता है।
  • पतंजलि द्वारा रचित “महाभाष्य” तथा कालिदास द्वारा रचित “मालविकाग्निमित्र” से शुंग वंश के इतिहास के बारे में ज्ञात होताहै द्वारा लिखी गयी थी।  
  • दक्षिण भारत के इतिहास के सम्बन्ध में संगम साहित्य से जानकारी प्राप्त होती है।  यह साहित्य अधिकतर तमिल और संस्कृत में है। 
  • संगम साहित्य में चोल, चेर तथा पांड्य शासनकाल की सामाजिक व्यवस्था, अर्थव्यवस्था तथा संस्कृति इत्यादि का विस्तृत वर्णन है। उसके बाद के  इतिहास की जानकारी नंदिक्कलम्ब्कम, कलिंगतुपर्णी, चोलचरित इत्यादि से प्राप्त होती है।

विदेशी स्त्रोत

  • विदेशी साहित्य से भी भारत के प्राचीन इतिहास के बारे में काफी जानकारी मिलती है। 
  • यह विदेशी लेखक विदेशी राजाओं के साथ भारत आये अथवा भारत की यात्रा पर आये, जिसके बाद उन्होंने भारत की सामाजिक, आर्थिक तथा भौगोलिक व्यवस्था का वर्णन किया। 
  • विदेशी साहित्यिक स्त्रोतों को 3 भागों में बांटा जा सकता है –  
    • यूनानी व रोम के लेखक, 
      • हेरोडोटस व टिसियस का वर्णन यूनानी लेखकों में सबसे प्राचीन है। 
      • हेरोडोटस ने “हिस्टोरिका” नामक पुस्तक लिखी थी, 
      • यह पुस्तक भारत और फारस के संबंधो पर प्रकाश डालती है, 
      • हेरोडोटस को इतिहास का पिता भी कहा जाता है।
    • चीनी लेखक 
      • चीनी मुख्यतः भारत में धार्मिक यात्रा के उद्देश्य से आये थे। 
      • वे मुख्यतः बौद्ध धर्म का अध्ययन करने के उद्देश्य से भारत आये। 
      • चीन से भारत आने वाले यात्रियों में फाह्यान, ह्वेन्त्सांग तथा इत्सिंग प्रमुख हैं। 
      • फाह्यान चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में भारत आया, उसने अपनी पुस्तक “फ़ो-क्यों-की” में भारतीय समाज, राजनीती तथा संस्कृति का वर्णन किया है। 
      • ह्वेन्त्सांग हर्षवर्धन के शासनकाल में भारत आया, उसने अपने यात्रा वृत्तांत में भारत की आर्थिक व सामाजिक स्थिति पर प्रकाश डाला। 
      • तिब्बती लेखक तारानाथ ने अपनी पुस्तक “कंग्यूर” “तंग्युर” में भारतीय इतिहास पर प्रकाश डाला है।
    • अरबी लेखक
      • अरबी लेखक मुस्लिम आक्रान्ताओं के साथ भारत आये।
      • आठवीं शताब्दी में अरब शासकों ने भारत पर आक्रमण शुरू कर दिए, अरब शासकों के साथ उनके लेखक व कवि भी भारत आये। 
      • जबकि अलबरुनी ने अपनी पुस्तक “तहकीक ए हिन्द” में गुप्तकाल के पश्चात के समाज के बारे में लिखा है

चीनी लेखक 

  • चीनी मुख्यतः भारत में धार्मिक यात्रा के उद्देश्य से आये थे। 
  • वे मुख्यतः बौद्ध धर्म का अध्ययन करने के उद्देश्य से भारत आये। 
  • चीन से भारत आने वाले यात्रियों में फाह्यान, ह्वेन्त्सांग तथा इत्सिंग प्रमुख हैं। 
  • फाह्यान चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में भारत आया, उसने अपनी पुस्तक “फ़ो-क्यों-की” में भारतीय समाज, राजनीती तथा संस्कृति का वर्णन किया है। 
  • ह्वेन्त्सांग हर्षवर्धन के शासनकाल में भारत आया, उसने अपने यात्रा वृत्तांत में भारत की आर्थिक व सामाजिक स्थिति पर प्रकाश डाला। 
  • तिब्बती लेखक तारानाथ ने अपनी पुस्तक “कंग्यूर” “तंग्युर” में भारतीय इतिहास पर प्रकाश डाला है।

अरबी लेखक

  • अरबी लेखक मुस्लिम आक्रान्ताओं के साथ भारत आये।
  • आठवीं शताब्दी में अरब शासकों ने भारत पर आक्रमण शुरू कर दिए, अरब शासकों के साथ उनके लेखक व कवि भी भारत आये। 
  • जबकि अलबरुनी ने अपनी पुस्तक “तहकीक ए हिन्द” में गुप्तकाल के पश्चात के समाज के बारे में लिखा है


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